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रावण ने क्यों रचा शिव तांडव स्त्रोत

यूं बना रावण शिवभक्त

कहा जाता है कि ऋषि विश्रवा ने सोने की लंका कुबेर को दी थी। लेकिन कुबेर का मन नहीं रमा। उन्होंने सब त्याग दिया। रावण लंकाधिपति बना। कालान्तर में रावण ने कुबेर की नगरी पर भी आधिपत्य कर लिया। पुष्पक विमान भी कब्जा लिया। एसी कथा आती है कि एक बार रावण पुष्पक विमान से सैर कर रहा थआ। तभी एक पर्वत के पास आकर उसके विमान की गति कम हो गई। रावण को घोर आश्चर्य हुआ। पुष्पक विमान की गति कैसे कम हो सकती है। नंदीश्वर ने समझाया कि यहां भगवान शिव का वास है। वह ध्यान में हैं। चले जाओ। अहंकारी रावण नहीं माना और उसने पर्वत को उठाना चाहा। नींव पर हाथ रखा ही था कि भगवान शंकर ने अपने पैर के अंगूठे से उसको दबा दिया। रावण का हाथ उसमें दब गया। बहुत कोशिश की, लेकिन रावण मुक्त नहीं हो सका। मंत्रियों ने समझाया कि शंकर जी कुपित हो गए हैं। इनकी स्तुति करो। तब असहनीय दर्द से कराहते हुए रावण ने शिव तांडव स्तोत्र की रचना की। इससे भगवान शंकर प्रसन्न हुए और रावण को भार से मुक्त किया। माना जाता है कि यही पीड़ा  संस्कृतनिष्ठ शिव तांडव स्तोत्र में अभिव्यक्त हुई है।

विरले ही पढ़ पाते हैं इसे

यह रावण स्तोत्र बोलने और पढ़ने दोनों में कठिन है। बहुत कम ही लोग इसको पढ़ पाते हैं और बोल पाते हैं। इसमें अकार, उकार और मकार के साथ ही श्वास की आरोह और अवरोह की अद्भुत क्रिया है। कुछ बंद तो एक ही श्वांस में पढ़े जाते हैं।
 
पितृ दोष निवारण और काल सर्प दोष में मंगलकार

यदि कालसर्प दोष है या कोई पितृ दोष से पीड़ित है तो उसके लिए शिव तांडव स्तोत्र अमोघ औषधि है। इसके एक बार के ही पाठ से सारे ताप दूर हो जाते हैं। शिव तांडव स्तोत्र पढ़ते जाइये, शंकर जी को काले तिल से स्नान कराते रहिए….सारे कष्ट दूर।