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स्त्री’ की रचना के समय भगवान भी पड़ गए समस्या में, ये है स्त्री की रोचक कथा

रोचक

 भी एक अजीब तरह की पहेली है जिसे आज तक भगवान भी नही समझ पाये। उसके बारे में ऐसा भी कहा जाता है कि उसे समझना बहुत मुश्किल है। कहा जाता है भगवान जब स्त्री की रचना कर रहे थें, तब उन्हे इतना समय लग गया कि देवदूत भी उनसे सवाल करने लगे थें कि आखिर आपको इतना समय क्यों लग रहा है?

# देवदूतों के इस प्रश्न के जवाब में भगवान् ने उतर दिया कि क्या तुमने इसके गुण देखे है ? ये मेरी वो रचना है जो हर हालत में डटी रहती है और खुद को संभाले रखती है। फिर स्थिति चाहे कैसी भी हो ये सबको खुश रखती है । अपने परिवार और सब बच्चो को एक सा प्यार करती है । ये न केवल अपना ख्याल खुद रखती है बल्कि बीमार होने के बावजूद भी 18 घंटे काम करने की क्षमता रखती है ।

# देवदूत ने जब पास जाकर स्त्री के गालों को हाथ लगाया तब उन्हें कुछ पानी जैसा प्रतीत हुआ तो उन्होंने पूछा कि “हे भगवान्” ये इसके गालों पर पानी जैसा क्या है ? भगवान् ने कहा ये आंसू है, “जब भी कभी ये कमज़ोर पड़ने लगे तब ये अपनी सारी पीड़ा आंसुओ के साथ बहा देती है और फिर से मजबूत बन जाती है। अर्थात अपने दुखो को भुलाने का इसके पास ये सबसे बेहतर तरीका है।”

# इसके बाद देवदूत ने पूछा कि आपकी रचना सम्पूर्ण है तो भगवान ने जवाब दिया कि नहीं अभी इसमें एक कमी है और वो ये कि “ये अपना ही महत्व भूल जाती है कि ये कितनी खास है और इसमें क्या क्या गुण है।”

# भगवान की स्त्री रुपी रचना जो खुद का महत्व भूल कर आपको महत्वपूर्ण बनाती है, उस रचना को तिरस्कृत करना कहां तक उचित है? जिस समाज को वो प्यार से सींचती है, उसी समाज में उस पर अत्याचार कहां तक उचित है? स्त्री के महत्वों को समझना चाहिए क्योंकि स्त्री नहीं होगी, तो ना आप होंगें औऱ ना ही हम, ना तो ये दुनिया होगी और ना ही ये दुनियादारी।