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नवरात्रि में 9 शक्ति पीठों की कहानी- इस शक्तिपीठ में आने मात्र से जाग जाता है भाग्य

मां दुर्गा के उपासकों को चैत्र नवरात्रि का बेसब्री से इंतजार रहता है. आज से चैत्र नवरात्रि शुरू हो गए हैं. ये पर्व इसलिए भी खास है क्योंकि पूरे 9 दिनों तक मां दुर्गा की उपासना का उत्सव मनाया जाता है. शक्ति की उपासना का ये पर्व 13 अप्रैल (13 अप्रैल 2021) से शुरू होकर 21 अप्रैल तक चलेगा.

नवरात्रि के आरंभ के साथ ही हिन्दू नववर्ष की शुरुआत भी हो रही है. इस साल चैत्र नवरात्रि पर मां दुर्गा देवी का आगमन घोड़े पर होगा. जबकि देवी का प्रस्थान कंधे पर होगा. आज हम आपको मां से जुडे़ शक्तिपीठों के बारे में बताएंगे.. आपको बताएंगे की क्यों इनको शक्तिपीठ कहा जाता है.

क्‍यों कहते हैं शक्तिपीठ
हिंदू धर्म के अनुसार शक्तिपीठ यानी वो पवित्र जगह जहां पर देवी के 51 अंगों के टुकड़े गिरे थे. ये शक्तिपीठ भारत के अलावा, बांग्‍लादेश, पाकिस्‍तान, चीन, श्रीलंका और नेपाल में फैले हुए हैं. जी हां, चीन के कब्‍जे वाले तिब्‍बत में एक शक्तिपीठ है. एक तो बलूचिस्‍तान में भी है.आईये आज आपको उन शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ की महिमा सुनाते हैं…

कालीघाट मंदिर कोलकाता- पहला शक्तिपीठ
मां काली को देवी दुर्गा की दस महाविद्याओं में से एक माना जाता है. मां काली के चार रूप है- दक्षिणा काली, शमशान काली, मातृ काली और महाकाली. पश्चिम बंगाल कोलकाता के कालीघाट में माता के बाएं पैर का अंगूठा गिरा था. मान्यता के अनुसार मां सती के दाएं पैर की कुछ अंगुलियां इसी जगह गिरी थीं. आज यह जगह काली भक्तों के लिए सबसे बड़ा मंदिर है. बंगाल ही नहीं, देश-दुनिया से लोग यहां माता के दर्शन के लिए आते हैं.

ऐसा है स्वरूप
कालीघाट मंदिर में देवी की प्रतिमा में मां काली का मस्तक और चार हाथ नजर आते हैं. ये प्रतिमा एक चौकोर काले पत्थर को तराश कर बनाई गई है. यहां मां काली की जीभ काफी लंबी है जो सोने की बनी हुई है और बाहर निकली हुई है. दांत सोने के हैं. आंखें तथा सिर गेरूआ सिंदूर के रंग से बना है और माथे पर तिलक भी गेरूआ सिंदूर का है. प्रतिमा के हाथ स्वर्ण आभूषणों और गला लाल पुष्प की माला से सुसज्जित है.

अष्टमी को होती है विशेष पूजा
यहां पर मंगलवार और शानिवार को अष्टमी को विशेष पूजा की जाती है और भक्तों की भीड़ भी बहुत ज्यादा होती है. मंदिर सुबह 5 बजे से रात 10:30 तक खुला रहता है. बीच में दोपहर में यह मंदिर 2 से 5 बजे तक बंद कर दिया जाता है. इस अवधि में मां को भोग लगाया जाता है. सुबह 4 बजे मंगला आरती होती है लेकिन भक्तों के लिए ये मंदिर सुबह 5 बजे ही खोला जाता है.

मंदिर में “कुंडूपुकर” नामक एक पवित्र तालाब है जो मंदिर परिसर के दक्षिण पूर्व कोने में स्थित है. इस तालाब के पानी को गंगा के समान पवित्र माना जाता है. ऐसा कहा जाता है कि इस तालाब के पानी में स्नान करने से हर मन्नत पूरा होती है. मां कालिका के अलावा शीतला, षष्ठी और मंगलाचंडी के भी स्थान है.