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आपके ये चार काम ही आपको गरीब बना रहे हैं..

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जब आप अपनी वित्तीय स्थिति की समीक्षा करते हैं तो कैसा लगता है? अगर आपने ठीक ठाक धन जुटा लिया है तो क्या आपको संतोष का एक एहसास होता है? रिसर्च बताते हैं कि बहुत से लोग अपनी वित्तीय स्थिति से अंसतुष्ट और असुरक्षित महसूस करते हैं. अधिकतर लोग यह मानते हैं कि वे और बेहतर कर सकते थे या उन्होंने अभी बहुत अच्छा नहीं किया है.

हम पैसे और संपत्ति के बारे में कैसे सोचते हैं, यह कई फैक्टर पर निर्भर करता है. सायकोलॉजिस्ट कहते हैं कि हममें से हर किसी की पैसे को लेकर अपनी कहानी है. अपने अनुभव के आधार पर हम पैसे से जुड़ी कई धारणा भी बनाते हैं.हमारे हाथ में हालांकि कुछ सूत्र होते हैं कि ऐसा करते तो और बेहतर हो सकता था, या हम इस तरीके की मदद से बेहतर कमाई कर सकते थे, या हमारी क्षमता कहीं बेहतर कमाई कर पाने की थी. ऐसे बहुत से लोग हैं जिनकी उम्मीदें उनकी वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाती.

बहुत से धनी लोग भी भय और असुरक्षा के माहौल में जीते हैं, साथ में वे अपनी संपत्ति को पर्याप्त भी नहीं मानते. जो उनके पास है उसे खोने का डर, या ठगी की वजह से नुकसान को रोकने के लिए वे मास्क, छुपाने या संपत्ति की तुलना में गरीब दिखने की कोशिश करते हैं. संपत्ति को लेकर यह असुरक्षा अमीरों में अपने वर्थ को लेकर कमजोर सोच से आती है या बहुत संपत्ति जुटाने लायक नहीं होने के कॉम्प्लेक्स से आती है. अमीरों में वित्तीय असुरक्षा दरअसल अब गंभीर मानसिक बीमारी की शक्ल ले चुकी है.

गरीब लोग रोज की जरूरतों को पूरी नहीं कर पाने की वजह से झेलने वाली मुसीबत को वित्तीय असुरक्षा मानते हैं. भविष्य के लिए अनिश्चित माहौल, नियमित आय की कमी, मानवीय और प्राकृतिक आपदा से जोखिम, अवांछित बीमारी और अपराध या हिंसा में फंसने के डर की वजह से उन्हें काफी चिंता रहती है. कई स्टडी में पाया गया है कि पुरे देश में सामाजिक सूचकांकों को बेहतर बनाकर लोगों के इस डर पर काबू पाया जा सकता है. इसमें बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य और इंफ्रास्ट्रक्चर की मदद से उनके जीवन को बेहतर बनाना शामिल है.
पहला जीवनयापन है. अगर कोई व्यक्ति आमदनी के नुकसान की संभावना देख रहा है, वित्तीय सुरक्षा का कोई जरिया नहीं है और दाल-रोटी की चिंता उसे खाए जा रही है.मानवीय इतिहास में ह्यूमन ट्रैफिकिंग से लेकर गुलामी और बंधक जैसी चीजों का चलन जीवन यापन के विकल्पों के तौर पर ही रहा है. आधुनिक समय में भी बहुत से लोग ऐसे कम में जुटे हैं, जिनसे आम तौर पर लोग घृणा करते हैं.

दूसरा फैक्टर है संबंधों की भविष्यवाणी. हम जान-पहचान वाले चेहरे और पसंदीदा बात-चीत के दायरे में रहना पसंद करते हैं. हमारे आस पास के लोगों का व्यवहार हमारी वित्तीय सुरक्षा या असुरक्षा पैदा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. कोई पैरेंट जब बच्चे को उसकी क्षमता के हिसाब से प्रदर्शन नहीं करने के लिए डांटता है, या जब कोई बच्चा पडोसी के घर में अच्छी सुविधाओं की बात करता है या जब कोई दोस्त जरूरत पर साथ नहीं दे पाता तो वित्तीय सुरक्षा या असुरक्षा का भाव जन्म लेता है.

तीसरा फैक्टर है हिंसा और अपराध से सुरक्षा का भाव. स्टडी बताती है कि भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं में महिलाएं बहुत प्रतारित महसूस करती हैं. ये समाज उसकी आर्थिक आजादी को स्वीकार नहीं करते. संबंधों में कटुता और महिलाओं के खिलाफ हिंसा महिला की वित्तीय आजादी पर बड़ा खतरा हैं. उस समाज में जहां अपराध बढ़ रहे हों, कानून का शासन पीछे छूट रहा हो और अपराधी बच जाते हों, वहां अमीर-गरीब सब में असुरक्षा का भाव पैदा होता है.

चौथा महत्वपूर्ण फैक्टर किसी सामाजिक ग्रुप से जुड़े होने का भाव है. रीति रिवाज, संस्कृति, परंपरा आदि से जुड़े होने का भाव आपको एक पहचान दिलाता है और सामाजिक समूह में आपको इज्जत दिलाता है. समाजशास्त्री कहते हैं कि जो लोग अपने सामाजिक और सामुदायिक ग्रुप में बेहतर प्रदर्शन करते हैं, उनमें सुरक्षा का भाव बेहतर होता है. अच्छे पहचान वाले सामाजिक समूह और नेटवर्क किसी अनिश्चित माहौल में आपको सुरक्षा का भरोसा दिलाते हैं.