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इस तारीख से लग रहा होलाष्टक, इन सामग्री से करें पूजन नही तों हो जाओगें……😱

धार्मिक

हर साल होली का त्यौहार फाल्गुन माह की शुक्लपक्ष में मनाया जाता है। होली के त्यौहार के पहले ही हो’लाष्टक लग जाता है। हो’लाष्टक फाल्गुन शुक्ल पक्ष अ’ष्टमी से लग जाता है। इसके बाद जब पूर्णिमा के दिन आता है, तो ये हो’लिका दहन के साथ ही समाप्त हो जाता है। धार्मिक मान्यता है कि हो’लाष्टक के समय किसी तरह के कोई भी मंगल कार्यों को नहीं करना चाहिए। कहा जाता है कि इस दौ’रान जितना ज्यादा हो सकें मन को पूजा पाठ और भगवान के भजनों में ही लगाना चाहिए। जब होली का पर्व समाप्त होगा, उसके बाद से ही शुभ कार्यों की शुरुआत की जाएगी। होली के पहले के आठ दिन हर शुभ कार्य करना व’र्जि’त होगा। माना जाता है कि हो’ला’ष्टक के समय भगवान भक्त प्रह्लाद को जो पी’ड़ाएं दी गई थी, उनको याद रखन के लिए हो’लाष्ट’क मनाया जाता है। हो’लाष्ट’क के पीछे भक्त प्रहलाद की कथा भी चर्चित है।

होलाष्टक की कथा रा’क्षसों के राजा  हि’रण्यक’श्यप और उनके बेटे भक्त प्रह्लाद की कथा के बारे में तो सबकों पता होगा। इस कथा के अनुसार हि’रण्यक’श्यप के पुत्र प्रह्लाद पैदाइशी ही हरि के भक्त थे। इसी के विपरीत वहीं उनके पिता हि’रण्यक’श्यप को भगवान विष्णु से घृ’णा थी। हि’रण्यक’श्यप  ने अपने बेटे प्रहलाद को हरि की भक्ति न करने के लिए बहुत बार समझाया, लेकिन जब प्रहलाद पर अपने पिता की बातों का कोई असर नहीं हुआ, तो पिता ने अपने पुत्र के मन में उनका भय उत्पन्न करने के लिए प्रहलाद को कई तरह की या’तनाएं और पी’ड़ाएं देना शुरु कर दिया। फिर भी भक्त प्रहलाद पर इन सबका कोई असर नहीं पड़ा, जिसके बाद हिर’ण्यक’श्यप ने गु’स्से में आकर अपने सै’निकों को प्रह्लाद को पहाड़ी से नीचे फेंक देंने के आ’देश दिया।

स्वामी की बात को मानकर सै’निकों ने ऐसा ही किया, लेकिन जब प्रहालाद को ऊपर पहाड़ी से नीचे फेंका तो साक्षात भगवान विष्णु ने आकर  अपने भक्त को गोद में ले लिया और प्रहलाद की जा’न बच गई। इसके बावजूद भी हि’रण्यक’श्य’प की या’तनाएं ख’त्म ना हुईं और अंत में उन्होंने अपनी बहन हो’लिका से कहा कि वो प्रहलाद को लेकर आ’ग में बैठ जाएं, जिससे प्र’ह्लाद जल के रा’ख हो जाएं। ऐसा इसलिए क्योंकि हो’लिका को भगवान से ये वरदान मिला था कि वो कभी भी आग से नहीं जल सकती हैं। अपने भाई हि’रण्य’क’श्य’प की बात मानकर होलि’का भतीजे प्रह्लाद को लेकर बैठ गयीं, लेकिन भगवान विष्णु की कृपा से आग की लपटें भी भक्त प्रह्लाद का कुछ बि’गाड़ नहीं पाईं। बल्कि इसके वि’परीत हो’लिका ही आग की ल’पटों में जलने लगी। ऐसा माना जाता है कि उसी दिन ही फा’ल्गुन शुक्ल पक्ष अ’ष्टमी थी, उस दिन से हो’ला’ष्ट’क मनाया जाने लगा।


इसके अलावा एक और कथा प्रचलन में हैं। फाल्गुन मास की अष्टमी तिथि को कामदेव को भगवान शिव ने भ’स्म कर दिया था, जिसके बाद पूरी पृथ्वी में दु’ख भर गया और सबने शुभ कार्य करना भी बंद कर दिया था।


क्या होनी चाहिए पूजा सामग्री

पूजा सामग्री में एक लोटा जल, माला, रोली, चावल, गंध, पुष्प, कच्चा सूत, गुड़, साबुत हल्दी, मूंग, बताशे, गुलाल, नारियल आदि का होना जरूरी है। इसके अलावा भी नई फसल के धान जैसे कि पके हुए चने की बालियां व गेहूं की बालियां भी सामग्री के रूप में पूजा में इस्तेमाल होती हैं। इसके अलावा हो’लि’का के पास गो’ब’र से बनी हुई ढ़ाल और अन्य खिलौने भी रखे जाते हैं। इसी के साथ होलिका दहन होने के बाद होलिका में जिन-जिन वस्तुओं की आ’हुति दी जाती है, उनमें से कच्चे आम, नारियल, भुट्टे या सप्तधान्य, चीनी के बने हुए खिलौने, नई फसल का कुछ भाग भी मुख्य है। सप्तधान्य : गेहूं, उड़द, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर भी अर्पित की जानी चाहिए।