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धर्म : महादेव को कैलाश पर्वत से लंका ले जाना चाहता था रावण

आप सभी ने यह बात अवश्य सुनी होगी कि रावण में चाहे लाख बुराई थी पर वह महादेव का परम भक्त था। रावण लंका से नित्य महादेव की आराधना करने कैलाश आता था, तो एक बार रावण के मन में विचार आया क्यों न में महादेव को अपनी नगरी लंका ही ले चलूं, यह सोच कर उसने महादेव से कहा कि मैं आप का परम भक्त हूँ अतः महादेव आप मेरे साथ लंका चले इस पर महादेव ने कहा कि यह कैलाश ही मेरा घर है में नहीं चल सकता पर रावण अहंकारी स्वभाव का था उसको न सुनने की आदत नहीं थी, तो उसने सोचा क्यों न कैलाश को ही लंका ले चलता हूँ। रावण ने जब अपने हाथ कैलाश पर्वत के नीचे लगाया पर्वत को उठाने के लिए तो जैसे ही महादेव ने अपने पैर के अंगूठे से थोड़ा सा बल नीचे की ओर लगा दिया इससे रावण का हाथ पर्वत के नीचे दब गया और वह कराह उठा और महादेव से क्षमा मांगने लगा कहा उसे एहसास हो गया है उसकी गलती का और उसने महादेव को प्रशन्न करने के लिए उसी समय शिव तांडव स्त्रोत गया रावण संगीत विद्दा का पंडित था इससे महादेव प्रशन्न होकर लंका चलने के लिए तैयार हो गए।

यह सब देख कर देवता घबरा गए वे विष्णु जी के पास गए और कहा प्रभु अगर महादेव लंका चले गए तो अनर्थ हो जाएगा यह सब देख कर विष्णु जी ने कहा आप निश्चिंत रहिये। महादेव लंका चलने के लिए तैयार तो हो गए पर उन्होंने कहा मेरी एक शर्त है में शिव लिंग रूप में चलूंगा और एक बात जहाँ कहीं भी तुम मुझे स्थापित कर दोगे फिर वह स्थान मेरे लिए सदा के लिए स्थिर हो जाएगा किसी दूसरी जगह तुम मुझे स्थापित नहीं कर सकोगे फिर। इसके बाद रावण ने महादेव को प्रणाम किया और अपने साथ लेकर चल दिया परन्तु रास्ते में हरी की लीला की वजह से उसको तीव्र लघुशंका का वेग आया तो उसने मार्ग में रुककर देखा कहीं कोई दिख जाए उसे यह शिव लिंग पकड़ा कर में अपना लघुशंका कर ले।

उसको एक दूर बालक दिख गया वह उसके पास गया और बोला कि मुझे तीव्र लघुशंका का वेग आया है क्या तुम मेरे लघुशंका करके आने तक यह शिवलिंग पकड़ सकते हो तो वह बालक ने कहा में पकड़ लेता हूँ पर शीघ्र आना नहीं तो में इसको यहीं ऱखकर चला जाउंगा रावण को वेग तीव्र था तो उसने कहा ठीक है। प्रभू श्री हरि की लीला की वजह से रावण को लघुशंका करने में समय अधिक लग गया और बालक रूपी भगवान विष्णु उस शिवलिंग को वहीं जमीन पर रख दिया इससे महादेव के वचनानुसार वह वहीं स्थापित हो गया और रावण लाख चाह कर भी उसे हिला न सका। रावण को निराश ही वापिस लंका लौटना पड़ा।

बोलो प्रेम श्री राम चन्द्र की जय 🙏🙏