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जब कोई आप का भरोसा तोड़ दे तो क्या करें – श्री कृष्ण उपदेश

जब किसी व्यक्ति को किसी घटना में अन्याय का अनुभव होता है तो वह घटना उसके अंतर्मन को झकझोर देती है समस्त जगत उसे अपना शत्रु प्रतीत होता है। अन्याय लगने वाली घटना जितनी बड़ी होती है मनुष्य का हृदय भी उतना ही अधिक विरोध करता है उस घटना के उत्तर में वो न्याय मांगता है और उचित भी है वास्तविकता में समाज में किसी भी प्रकार का अन्याय व्यक्ति की आस्था और विश्वास का नाश कर देता है।

किंतु यह न्याय क्या है ? न्याय का अर्थ क्या है ? अन्याय करने वालो को अपने कार्य पर पश्चाताप और अन्याय भुगतने वाले के मन में फिर से विस्वाश जगे समाज के प्रति इतना ही अर्थ है ना न्याय का किंतु जिसके हृदय में धर्म नहीं होता वो न्याय को छोड़कर बैर और प्रतिशोध को अपनाता है हिंसा के बदले प्रतिहिंसा की भावना लेकर चलता है स्वयं भोगी हुई पीड़ा से कई अधिक पीड़ा देने का प्रयत्न करता है और इस मार्ग पर चलते हुए अन्याय को भुगतने वाला स्वयं अन्याय करने लगता है। शीघ्र ही वह अपराधी बन जाता है अर्थात न्याय और प्रतिशोध के बीच बहुत कम अंतर होता है और इसी अंतर का नाम है धर्म। क्या ये सत्य नहीं स्वयं विचार कीजिए