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कहा गया है कि किसी धार्मिक समूह द्वारा अपनाई गई परंपरा उस व्यक्ति को दंड का भागी बनने से छूट नहीं

हिंदी खबर

वकील हरिशंकर जैन और विष्णु शंकर जैन के जरिए यह याचिका जनउद्घोष संस्थान और पांच महिलाओं ने दाखिल की है। याचिका में कहा गया है कि आइपीसी की धारा 494 कहती है कि अगर कोई व्यक्ति पति या पत्नी के जीवित रहते दूसरी शादी करता है तो वह शादी शून्य मानी जाएगी और ऐसी शादी करने वाले को सात साल तक की कैद और जुर्माने की सजा हो सकती है।

कहा गया है कि किसी धार्मिक समूह द्वारा अपनाई गई परंपरा उस व्यक्ति को दंड का भागी बनने से छूट नहीं दे सकती जो कि अन्य लोगों के लिए दंडनीय है। इस मामले में मुसलमानों को दूसरी शादी करने पर दंड से छूट मिली है जबकि अन्य के लिए वह दंडनीय अपराध है। हिन्दू, ईसाई और पारसी समुदाय के कानूनों में जीवनसाथी के जीवित रहते दूसरी शादी की मान्यता और इजाजत नहीं है। जबकि मुस्लिम पर्सनल ला (शरीयत)अप्लीकेशन एक्ट 1937 जो शादी, तलाक आदि के मुस्लिम ला को मान्यता देता है उसमे मुसलमानों को चार शादियों तक की इजाजत है।

कहा गया है कि किसी धार्मिक समूह द्वारा अपनाई गई परंपरा उस व्यक्ति को दंड का भागी बनने से छूट नहीं दे सकती जो कि अन्य लोगों के लिए दंडनीय है। इस मामले में मुसलमानों को दूसरी शादी करने पर दंड से छूट मिली है जबकि अन्य के लिए वह दंडनीय अपराध है। हिन्दू, ईसाई और पारसी समुदाय के कानूनों में जीवनसाथी के जीवित रहते दूसरी शादी की मान्यता और इजाजत नहीं है। जबकि मुस्लिम पर्सनल ला (शरीयत)अप्लीकेशन एक्ट 1937 जो शादी, तलाक आदि के मुस्लिम ला को मान्यता देता है उसमे मुसलमानों को चार शादियों तक की इजाजत है।