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आपके दिमाग को शांत और तना’व मु’क्त कर देगी ये कथा, एक बार जरूर पढ़ें👇👇

हिंदी धार्मिक खबर

आदि शंकरा’चार्य अपने शि’ष्यों के साथ किसी बाजार से गुज’र रहे थे। एक व्यक्ति गाय को खीं’चते हुए ले जा रहा था। शंकरा’चार्य ने उस व्य’क्ति को रोका और अपने शि’ष्यों से पूछा, ‘‘इनमें से कौन बं’धा हुआ है? व्य’क्ति गाय से बंधा है, या फिर गाय व्य’क्ति से?’’. शिष्यों ने बिना किसी हि’चक के कहा, ‘‘गाय व्य’क्ति के अधी’न है। वह व्यक्ति उस गाय का मा’लिक है। उसी के हाथ में र’स्सी है। वह गाय वहीं जाएगी जहां उसकी र’स्सी थामे उसे मा’लिक ले जाएगा। व्यक्ति मा’लिक है और गाय उसके अ’धीन।’’ यह सुनकर शंकरा’चार्य ने अपने झोले से कैंची निका’ली और उस र’स्सी को काट दिया। रस्सी का’टते ही गाय दौ’ड़ने लगी और गाय को पक’ड़ने की चे’ष्टा में व्य’क्ति उसके पीछे-पीछे दौ’ड़ने लगा।शंकराचार्य बोले, ‘‘देखो क्या हो रहा है, अब ब’ताओ कौन किसके अ’धीन है?’’ गाय को तो उस मा’लिक में कोई रुचि ही नहीं है। वह गाय तो उस मालि’क से पीछा छुड़ा’ने में जुटी है। हम सबके साथ यही होता है। चीजें हमसे बं’धी नहीं होती, हम उनसे बंधे होते हैं हमारे दि’माग में कितनी भी फा’लतू बातें एकत्र हैं जिन्हें हमसे कोई मतलब ही नहीं है। वे स्व’तंत्र हैं, हम ही उनसे बंधे हुए हैं नती’जा वे हमा’री मा’लिक और हम उनके गुलाम बन चुके हैं हम उन्हें अपने नियं’त्रण में रखने का दंभ पाले रखते हैं पर वे हमें बांधे रहती हैं। जैसे ही यह बात समझ में आती है हमारा दिमाग गाय की तरह आजा’द होने लगता है। हम स्वयं को स्व’तंत्र मुक्त और शांत मह’सूस करने लगते हैं।