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गजब: इस देश में हर 3 साल में क’ब्रों से नि’का’ली जाती हैं ला’शें, फिर उनके साथ…..देखें त’स्वीर👇

जरा हटकें

दु’नि’या के अलग-अलग दे’शों में लोग क’ई त’रह के री’ति-रि’वाज को मानते हैं और अ’जी’बोग’रीब त’री’कों से उ’त्स’व मनाते हैं। लेकिन आज हम आपको एक ऐसे त्यो’हार के बारे में बताएंगे, जो ला’शों के साथ म’ना’या जाता है। जी हां, इस त्यो’हार के बा’रे में जा’न’कर आपको थो’ड़ा अ’जीब जरूर लगेगा, लेकिन यह बात बि’ल्कुल सही है। इं’डोनेशि’या की एक खास ज’नजा’ति इस त्यो’हा’र को म’ना’ती है, जिसे मा’नेने फे’स्टि’वल के तौ’र पर जा’ना जाता है।

अजब-गजब: इस देश में हर 3 साल में कब्रों से निकाली जाती हैं लाशें, फिर उनके साथ मनाया जाता है यह फेस्टिवल

मा’नेने फे’स्टिवल की शु’रुआ’त आज से लग’भग 100 सा’ल प’ह’ले हुई थी। इसे मनाने के पीछे ब’रप्पू गांव के लोग एक ब’हुत ही रो’मांच’क कहानी सु’ना’ते हैं। लोगों के मु’ताबि’क, सौ साल पहले गांव में टो’रा’जन ज’नजा’ति का एक शि’का’री जं’गल में शि’का’र के लिए गया था। पोंग रु’मासे’क नाम के इस शि’का’री को बी’च जं’ग’ल में एक ला’श दिखी। स’ड़ी-ग’ली ला’श को दे’खक’र रु’मा’सेक रु’क गया। उ’स’ने ला’श को अपने क’प’ड़े प’हनाक’र अं’ति’म सं’स्का’र किया।

अजब-गजब: इस देश में हर 3 साल में कब्रों से निकाली जाती हैं लाशें, फिर उनके साथ मनाया जाता है यह फेस्टिवल

इ’स’के बाद से रु’मा’सेक की जिं’द’गी में का’फी अच्छे बद’लाव आए और उसकी ब’दहा’ली भी ख’त्म हो गई। इस घ’टना के बा’द से ही इसके बा’द से रु’मासे’क की जिं’द’गी में काफी अच्छे ब’दला’व आए और उसकी ब’दहा’ली भी ख’त्म हो गई। इस घ’टना के बाद से ही टो’रा’ज’न ज’नजा’ति के लोगों में अपने पू’र्वजों के ला’श को स’जा’ने की प्र’था शु’रू हो गई। मा’न्य’ता है कि ला’श की दे’खभा’ल करने पर पू’र्व’जों की आ’त्मा’एं आ’शिर्वा’द देती हैं।

अजब-गजब: इस देश में हर 3 साल में कब्रों से निकाली जाती हैं लाशें, फिर उनके साथ मनाया जाता है यह फेस्टिवल

इस त्यो’हा’र को म’ना’ने की शु’रुआ’त किसी के म’र’ने के बाद ही हो जाता है। प’रिज’न के मौ’त हो जा’ने पर उ’न्हें एक ही दिन में न द’फना कर, ब’ल्कि कई दिनों तक उ’त्सव म’ना’या जाता है। यह स’ब ची’जें मृ’त व्यक्ति के खु’शी के लिए की जाती हैं और उसे अ’गली यात्रा के लि’ए तै’या’र किया जाता है। इस या’त्रा को पु’या कहा जाता है। इस त्यो’हार के दौ’रा’न प’रिज’न बै’ल और भैं’सें जैसे जा’नव’रों को मा’र’ते हैं औ’र उ’न’के सीं’गों से मृ’त’क का घर स’जा’ते हैं। मा’न्य’ता है कि जि’स’के घर पर जि’त’नी सीं’गें लगी हों’गी, अ’ग’ली या’त्रा में उसे उ’तना ही स’म्मान मि’ले’गा।

अजब-गजब: इस देश में हर 3 साल में कब्रों से निकाली जाती हैं लाशें, फिर उनके साथ मनाया जाता है यह फेस्टिवल

इसके बाद लोग मृ’त’क को ज’मी’न में द’फ’ना’ने की जगह ल’क’ड़ी के ता’बू’त में बं’द करके गु’फा’ओं में र’ख देते हैं। अ’गर किसी शि’शु या 10 सा’ल से कम उ’म्र के ब’च्चे की मौ’त हो तो उसे पेड़ की द’रारों में रख दिया जाता है। मृ’तक के श’रीर को कई दि’न तक सु’रक्षि’त रखने के लिए कई अलग-अलग तरह के कपड़ों में ल’पेटा जाता है। मृ’त’क को कपड़े ही नहीं फै’शने’बल चीजें भी पहनाई जाती हैं। सजाने-धजाने के बाद लोग मृ’तक को लक’ड़ी के ता’बूत में बं’दकर पहा’ड़ी गु’फा में र’ख देते हैं। साथ में ल’कड़ी का ए’क पुत’ला रखा र’क्षा करने के लि’ए रखा जाता है, जिसे ता’उ-ता’उ कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि ता’बू’त के अं’द’र रखा श’री’र म’रा नहीं है, बल्कि बी’मा’र है और जब तक वो सो’या हुआ है, उसे सु’रक्षा चाहिए होगी।