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क्या महामृत्युंजय मंत्र के जाप से नहीं रहता है मृत्यु का भय, जानिए………

धार्मिक खबर

महामृत्युंजय मंत्र-ओम त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिम पुष्टिवर्धनम। उर्वारुकमिव बन्धनात मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।।  की महिमा से सभी अभिभूत हैं। यह मृत संजीवनी विद्या का महत्वपूर्ण अंग है तो वेद का हृदय भी इसे ही बताया गया है।

शास्त्र कहता है – शरीरमाद्यं खलु धर्मासाधनम। अर्थात धर्म साधना के लिए शरीर पहला साधन है। सूर्य नारायण से प्रार्थना भी की जाती है कि सौ शरद तक हम जीवित रहें। स्वस्थ मन और स्वस्थ तन ही जीवन के वास्तविक धन हैं। स्वस्थ शरीर और स्वस्थ मन के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जाप अति प्रभावशाली है। भगवान शिव की जटा में जो चंद्रकला है, वही अमृतकला है, जिससे वे अपने भक्त को अमरता भी प्रदान करते हैं। यह भी सत्य है कि इस मंत्र के जाप से आपके मन में किसी भी तरह से मृत्यु का भय नहीं रहेगा। आप मोक्ष भी प्राप्त कर सकते हैं। मंत्र में आए त्र्यम्बकं में तीन- इच्छा, क्रिया और ज्ञान शक्ति माताएं विद्यमान हैं। महर्षि कणाद ने इन तीनों को ज्ञान, इच्छा और प्रयत्न के रूप में परिभाषित किया है। यजामहे का अर्थ है परमात्मा के लिए अपने आपको समर्पित कर उससे संबंध जोड़ना। सुगन्धिम का अर्थ है, वह परमात्मा जो समस्त तत्वों के मूल स्वरूप को बनाये रखता है। उन्हें विकृत नहीं होने देता।

पुष्टिवर्धनम से स्पष्ट है कि परमात्मा पोषण, लक्ष्मी और भूति है,पुष्टिवर्धक है। इसे प्रकृति कहते हैं। उर्वारुकमिव बन्धनात से ज्ञात होता है कि जन्म-मरण रूपी बंधन से मृत्युंजय को प्राप्त कर सकते हैं। इसमें मंत्र जाप करने वालों को अज्ञानता के रोग से भी मुक्ति मिलेगी। मृत्योर्मुक्षीय मामृतात बताता है कि जाप करने वाले ने सतत एकरूप ब्रह्मा से संबंध जोड़लिया है। मंत्र जाप करने से पहले मन में कैलाश पर्वत को अपने गौर वर्ण से लजाने वाले, नवीन चंद्रमा को मस्तक पर धारण करने वाले महादेव का ध्यान करें। मूर्ति या चित्र या शिवलिंग के पास दीपक जलाएं।


हो सके तो ब्रह्ममुहूर्त यानी सूर्योदय से एक घंटे पूर्व, शिवप्रिय रुद्राक्ष की माला से कम से कम 11 माला अवश्य करें। शमी, दूर्वा और बेलपत्र चढ़ाएं। आसन पर बैठकर मन ही मन जाप करें। इन दिनों शुद्ध और सात्विक जीवन में रहें।